Tuesday, April 28, 2009

तलाश... मंज़िल की...!!!

तलाश एक अदद मंजिल की ,
जो दे मुझे वो खुशी जिसकी मुझे है चाहत |

पर इस तलाश से पहले ,
क्यों न खोज लूँ ,
ख़ुद में छिपी उस चाहत को
जो देगी मुझे खुशी
या की उस खुशी की परिभाषा
जो इस चाहत में कहीं
घूंघट छिपाए बैठी है |
इसीलिए जारी है ,
तलाश एक अदद मंजिल की,
जो दे मुझे इस शक -शुबह से राहत ||

मेरे इस फलसफे को को सुनकर ,
पूछ बैठे कुछ लोग,
कि
लोग मंजिलें पाकर खुश होते हैं
या
खुशियाँ पाने के लिए मंजिलें बनते हैं ?
ये प्रश्न लगता तो है
बड़ा ही सीधा -साधा
पर दिलो-दिमाग दोनों को
झकझोर कर रख दे , ऐसा है इसमें कुछ ज्यादा |
शायद ,
या सच में
कायम रखूं मैं
तलाश एक अदद मंजिल की
दे सके जो जवाब इन सवालातों के,
बिन किए मुझे आह़त ||

सुना, देखा या पढ़ा होगा ,
जरूर से हम सभी ने,
उद्देश्यहीन , लक्ष्यहीन, ध्येयविहीन ,
जीवन,
मानव का है पशुवत,
हाय ,ये विडम्बना है
फिर भी क्यों चुने हमराह जिसका हो एक छोर निश्चित |
तभी तो क्यों छोड़ दूँ
तलाश एक अदद मंजिल की,
दिखा सके जो मुझे डगर जिसकी है सीमा अपरिमित ||

सपनों, ख्यालों और कल्पनाओं
की दुनिया है कितनी इतर
इन्हें न हो किसी,
ख़ास मकसद,इरादे या परिणाम की फिकर ,
जो हैं इस दुनिया के वासी ,
उन्हें तो न रहती है ख़ुद की भी ख़बर |
उन्ही की ख़बर लेने की खातिर,
तलाश एक अदद मंजिल की,
जो दे सके मुझे उस पराभूत सोच से जन्मी यादों की विरासत ||

दिखने में ये संसार जैसा है ,
तुमने कभी इसके भीतर झाँककर देखा है ?
बाहर से जो दिखता मालामाल है, खुशहाल है,
उसके मन में चल रहा होता एक बड़ा भूचाल है,
सुख और चैन का भेद जानना चाहा है ?
इक तो होती है अपनी, दूजी है परायी
फिर भी दुनिया ने हमेशा सुख को ही पाया
तो चैन को खोया है |
बस उसी,
सुख को चैन से मिलाने की खातिर ,
तलाश एक अदद मंजिल की,
जिसकी नियति में लिखा है बिछुड़ना
फिर भी प्रयास है यथावत ||

जारी रहेगी ,
तलाश एक अदद मंजिल की
ताकि मिल सके मुझे वो खुशी जिसकी है मुझे चाहत ||

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